व्यक्तिगत यात्रा
चालीस वर्षों की साधना — और सत्य का उदय
जो बीता — वह छुपाने के लिए नहीं। सरल-सहज-निर्मल लोगों को सचेत करने के लिए है।
पिछले चालीस वर्षों से उसी गुरु के शिरोमणि स्वरूप में लगातार निरंतर रहा — करोड़ों रुपए, तन, मन, धन, दशकों का समर्पण। उस गुरु से अनंत असीम प्रेम किया — इतना कि खुद का चेहरा तक भूला हुआ हूं।
पर वही गुरु खुद में ही मौजूद नहीं था — ढोंग, पाखंड, षड्यंत्र रच कर — सरल लोगों को तर्क-तथ्य-विवेक से वंचित कर — दो हजार करोड़ का साम्राज्य, पच्चीस लाख अनुयायी, चार सौ आश्रम खड़े किए।
कुछ दिन पहले मैं गया — मुझे पूछने लगा: "आप कौन और कहाँ से हो?" — दिन-रात उनमें ही रहा हूं। मेरे दिए करोड़ों में से एक करोड़ वापस देने का वचन दिया था — साफ मुकर गए, आरोप लगाए, निष्कासित कर दिया।
उस असीम पीड़ा से — मैंने खुद के हृदय की अनंत गहराई में गोता लगाया। वहाँ जो मिला — वह सृष्टि में कहीं नहीं मिला। यही निष्पक्ष समझ है। यही यथार्थ युग है।